ख़ामोशी के अफ़साने में शब्दोँ का दमन नही होता शोर के मध्य शान्ति का असर नही होता ठीक जैसे अन्धकार हो जाता है विलुप्त हर उषा को सच नहीं बैठता देर तक अन्धकार कि चादर ओढ़हे देखी पर विश्वास है पर विश्वास तो अदृश्य है दरख्वास्तें हुई, पर्दे भी हटे सच कि अंतः विजय हुई पर एक कसक रह गई दिल के एक कोने में , बंजर ऐतबार कर लिया होता गर आज कहानी कुछ और होती हमें वक्त ने गढ़ा शर्त पर उसके मुताबिक ढल जाने को शायद हम वक्त को ढाल लेते अपने अनुसार लाख आजमाने पर