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जीवन संध्या

अब कोई नहीं आएगा दरवाजे बंद कर लो  सांझ की बेल में सबको नींद आ जाती है  दीपक को भुझा दो  रात की सियाही में नयनों को ज्योत काफी है  उद्द्गारों को आखों में समेट लो उसे सुनाने का वक्त कहाँ बाकी है  शाम  - ऐ वक्त की सुबह होती है  जीवन संध्या में भोर नहीं होती है  दादी जी द्वारा रचित कविता - स्वर्ण कौर