कहाँ - कहाँ ये चले जाते हैं कवि , भावनाओ के समुंदर में डुबकी लगा संवेदनाओ के अनमोल मोती चुन लाते हैं , जिस यथार्थ से अछुता है भुक्त भोगी , उसे हर पल जीते हैं ये बन कर योगी , सतह से वास्ता न कोई इनका , गहराईयों से ले आते हैं ज्योति , काल जय लेखनी बन इनकी अवरोध देती प्रलय क्रीड़ा की , समय बोध है इनकी अचुद थाती करुना से हैं ह्रदय के प्यास भुझाते मेरी दादी जी द्वारा - स्वर्ण कौर