Sunday, May 05, 2013

अलफ़ाज़


दिल से निकले अलफ़ाज़ गूंजने दो
इस तम्मना भरे दिल की चाहत 
राज खोलने की है 
इन्हें अश्कों में बयाँ होने दो
 मुस्कुराहटों के पीछे छिपे
दर्द में लिपटे होंटों
 की सुनवाई आज होने दो 
दिल के अलफ़ाज़ अश्कों में बयाँ होने दो 
धुन्दला सी गई मेरी मंजिल 
इस बावरे मन को 
एक पल ही सही ठहरने दो 
पल पल गुज़रती रही हादसों से मैं 
एक बार उन हादसों को मुझसे गुजरने दो 
दिल के अलफ़ाज़ अश्कों में बयाँ होने दो 



P.S.- Need not worry. It's just the part of my sentiments directed by my imagination. 

1 comment:

  1. Then, I should say what an imagination, Madamji! ;) :)

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~Simran