Thursday, July 07, 2011

साधना

मेरी प्यारी दादी (स्वर्ण कौर)
जब चिथड़ो मे लिपटे कलाकार ,
मोटी मोटी रोटियों  निगलते हैं,
तब एक प्रश्न चिन्ह  उभर आता है ,
इन ईंट सी रोटियों मे क्या इतनी ऊर्जा है ?
निरंतर अगड़ित ईटों को ढोते हुए वे कलांत नहीं होते ,
हम मेवे खाने वाले  मे इतने  अच्छम है की एक ईंट भी उठा लें ,
तब एक आकाशवाणी मन मे होती है ,
तुम तन के केंद्रित्करण हो ,
वे मन के केंद्रित्करण हैं ,
तुम भुक्त भोगी  हो ,
वो मुक्त भोगी हैं ,
तुम जीवन की  सम्पूर्ण शक्ति को तन मे समोते हो ,
वे जीवन की सम्पूर्ण शक्ति को मन मे समोते  हैं ,
तुम जीवन के समस्त माध्र्य को रो कर पीते हो ,
वे जीवन की समस्त कड़वाहट को प्रेम से पीते हैं ,
तुम साधन हो वो केवल साधक हैं I

आपकी सराहना के लिए धन्यवाद !

6 comments:

  1. Dadiji ko mera pranam bolna, ham to unke bachhen hain, ham bhi seekhenge gahraise likhna.........! :) bahut achha kiya share kiya.

    dil ko choo gayi kavita

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  2. I wonder what is written on your post? I can't understand? hahaha. All I could see are just small boxes. :(

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  3. Bahut hi achha aur uchit vichaar hai, tabhi to ve kalakaar hain.

    Cheers,
    Blasphemous Aesthete

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  4. @Mohinee
    Bohot kuch hai seekhna sikhaana :)
    Thank you so much :)
    @Faye
    Awwww :( Translate it!

    @Anshul
    Bilkul :) thank you so much..

    Her blessings are with you all! :)

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  5. beautiful post. THis poem touched my heart,
    excellent write!

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  6. @संजय भास्कर
    Thank you so much :)

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~Simran